सरकारों ने चित्तौड़ दुर्ग पर ही भुलाया प्रताप का स्वाभिमान

सरकारों ने चित्तौड़ दुर्ग पर ही भुलाया प्रताप का स्वाभिमान
आजादी के 75 सालों बाद भी किले पर नहीं है महाराणा की प्रतिमा

मरूधर विशेष/हनुमान सिंह पुरावत
चित्तौड़गढ़- हरे रंग का सपना लेकर आए थे मुगल इस माटी में, महाराणा प्रताप ने फहरा दिया केसरिया उनकी छाती में …!
परन्तु, वर्तमान दौर में सबसे बड़ी विडंबना यह है कि विश्वविख्यात चित्तौड़ दुर्ग पर महाराणा प्रताप सिंह जी के त्याग और बलिदान से जुड़ी ऐसी कोई भी सारगर्भित जानकारी कहीं पर भी दर्शायी हुई नहीं है, जिसके मार्फत यहाँ के गाईड देशी व विदेशी पर्यटकों के समक्ष प्रताप के स्वाभिमानी जीवन को बयाँ कर सके। बल्कि, प्रताप तो जिये और लड़े भी चित्तौड़ के लिए ही थे।
हाल ही में, क्षत्रिय समाज ने ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण हिंदू समाज ने क्षत्रिय कुलभूषण, वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप सिंह जी की 483वीं जयंती देशभर में बड़े ही हर्ष और उल्लास के साथ मनाई। लेकिन आश्चर्य इस बात का होता है कि जिन्होंने चित्तौड़ की स्वतंत्रता के लिए स्वाभिमान के साथ समझौता न करके वन – वन भटककर घास की रोटी खाना मंजूर किया। उनके ही स्वाभिमान को सरकारें तो भूली सो भूली !
मगर, रजपूती इतिहास और क्षत्रिय हितों की खातिर लड़ने की बात करने वाले विभिन्न राजपूत संगठनों ने भी कभी इस बात पर गौर नहीं किया कि मेवाड़ के महाराणा की चेतक पर आरूढ़ एक आदमकद प्रतिमा चित्तौडगढ़ किले पर भी स्थापित हो ?
चूँकि, महाराणा के त्याग, बलिदान व समर्पण को उनकी प्रतिमा के रूप में देश के कई शहरों-कस्बों में तो जगह मिली, आखिर चित्तौड़ दुर्ग पर ही उन्हें स्थान क्यूँ नहीं मिल पाया ? जबकि उन्होंने तो अपना सम्पूर्ण जीवन चित्तौड़ की स्वतंत्रता के लिए ही खपा दिया था।
यहाँ गौर करने वाली बात यह भी है कि देश की आजादी के पश्चात सत्ता में रही सरकारों व उसमें संलग्न नेताओं ने महाराणा को स्वाभिमान और स्वतंत्रता के लिहाज से सबसे बड़ा प्रतीक महापुरूष तो माना, लेकिन 75 वर्षों बाद भी उन्हें चित्तौड़गढ़ के किले पर कोई स्थान नहीं दिलवा सके।
यहाँ सोचने वाली बात यह भी है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) ने चित्तौड़ किले पर एतिहासिक तथ्यों से संबंधित जो साईन बोर्ड दर्शा रखे हैं, उन पर प्रताप की जीवनी व स्वाभिमान हेतु किए उनके संघर्ष का कहीं भी कोई जिक्र नहीं मिलता ? जबकि, फतहप्रकाश महल संग्रहालय में प्राचीन सँस्कृति से संबंधित कई वस्तुओं सहित अस्त्र – शस्त्र, मूर्तियाँ व पहनावा मौजूद हैं। लिहाजा, इस संग्रहालय में महाराणा प्रताप सिंह जी की दीर्घा, कथा साहित्य व उनके प्रतीक चिन्हों की गैर मौजूदगी यही दर्शाती है कि निर्वतमान सरकारों ने उनके स्वाभिमान को एक प्रकार से अनदेखा ही किया है, या यूँ कहें कि भूला दिया।
सोचनीय विषय यह है कि राजस्थान ही नहीं अपितु, देशभर में महाराणा प्रताप के नाम से कई संगठन व संस्थायें संचालित हैं, लेकिन इन्होंने भी कभी यह जहमत नहीं उठाई कि, जिस दुर्ग को मुस्लिम आंक्राताओं से सुरक्षित रखने के लिए प्रताप ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, उसी किले पर न तो उनकी प्रतिमा है और न ही उनके स्वाभिमान को बयाँ करती कोई जानकारी।
हद तो यह हो गई कि केंद्र सरकार द्वारा संचालित लाईट एण्ड साउंड शो में भी महाराणा का कहीं कोई उल्लेख नहीं है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि इस शो की स्क्रिप्ट में महाराणा की शौर्य गाथा क्यों नहीं है ?
यहाँ मजे की बात तो यह है कि राजस्थान के किसी शहर में यदि महाराणा प्रताप की प्रतिमा दुर्दशा का शिकार हो जाती है अथवा असामाजिक तत्वों द्वारा उसे कोई नुकसान पहुंचा दिया जाता है, तो देशनोक (बीकानेर) में स्थित करणी माता के नाम से बने संगठन व महाराणा के नाम से बनी संस्थायें इस ओर सरकार-प्रशासन का ध्यान आकर्षित करने के लिए धरना प्रदर्शन तक करती देखी जाती रही है। लेकिन समझ से परे बात यह है कि इन्होंने चित्तौड़गढ़ किले पर वीर शिरोमणि की प्रतिमा स्थापित करवाने की दिशा में कभी कोई प्रयास क्यों नहीं किया ?
अत: इस दौर में महत्ती आवश्यकता इस बात की हो चली है कि क्षत्रिय इतिहास के संरक्षण, रजपूती स्वाभिमान की रक्षा व राजपूत हितों का दम्भ भरने वाले समस्त संगठन व संस्थायें एक मुहिम या पहल चित्तौड़ किले पर वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप सिंह जी की चेतक पर सवार आदमकद प्रतिमा की स्थापना के लिये भी शुरू करें, ताकि यहाँ सेवारत गाईड महाराणा प्रताप के चित्तौड़ हेतु किये संघर्ष से देश-विदेश के पर्यटकों को अवगत करवा सकें।